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मॉर्टगेज जल्दी चुकाने का कैलकुलेटर

सीमा: 100 – 1,00,00,000

सीमा: 0 – 50

सीमा: 1 – 600

सीमा: 0 – 1,00,000

नतीजा

254

बकाया चुकाने के महीने

वही, सालों में
21.2
बचे महीने
106
बचे साल
8.8
बचा ब्याज
1,38,444.91
नई मासिक क़िस्त
2,322.62
अतिरिक्त भुगतान के साथ ब्याज
2,69,695.73
बिना अतिरिक्त भुगतान के ब्याज
4,08,140.64

मॉर्टगेज जल्दी चुकाने का कैलकुलेटर एक ही सवाल का दो जवाब सामने रखता है: जैसा चल रहा है वैसा ही चलता रहे तो क़र्ज़ कब और कितने ब्याज पर ख़त्म होगा, और हर महीने थोड़ी ज़्यादा रक़म डालने पर वही क़र्ज़ कब और कितने ब्याज पर ख़त्म होगा। ब्याज हर महीने बाक़ी रक़म पर लगता है, इसलिए जल्दी चुकौती का फ़ायदा दो तरफ़ से आता है — बकाया तेज़ी से गिरता है, और जो ब्याज अब कभी लगेगा ही नहीं वह भी बच जाता है। 3,20,000 पर 6.5% और 360 क़िस्तें बाक़ी होने पर हर महीने 300 जोड़ने से क़र्ज़ 360 महीनों के बजाय 254 महीनों में ख़त्म हो जाता है — 106 महीने, यानी आठ साल से ज़्यादा — और कुल ब्याज 4,08,140.64 से घटकर 2,69,695.73 रह जाता है। जो 300 हर महीने जोड़े गए, वे पूरी अवधि में 31,800 बनते हैं, पर बचा ब्याज 1,38,444.91 है — यानी जोड़ी गई रक़म का चार गुना से भी ज़्यादा, और यही इस पेज का मुख्य आँकड़ा है। नीचे की संदर्भ सारणी एक ही क़र्ज़ पर अतिरिक्त भुगतान बदल-बदलकर वही तुलना चार बार करती है।

3,20,000 पर 6.5%, 360 क़िस्तें बाक़ी, अतिरिक्त भुगतान के हिसाब से

हर महीने ज़्यादाख़त्म होने के महीनेबचे महीनेबचा ब्याज
036000
1003144661698.04
25026793122992.85
500216144185551.21

हर पंक्ति वही क़र्ज़ है — 360 क़िस्तें बाक़ी, छह दशमलव पाँच प्रतिशत, और सिर्फ़ अतिरिक्त भुगतान बदलता है। पहला कॉलम चौथे के साथ पढ़िए: सौ के बजाय पाँच सौ हर महीने देने पर क़र्ज़ अट्ठानवे महीने और जल्दी ख़त्म होता है और बचा ब्याज एक लाख तेईस हज़ार से कुछ ज़्यादा बढ़ जाता है। वक्र सीधी रेखा नहीं है: शून्य से सौ तक जाने पर छियालीस महीने बचते हैं, सौ से ढाई सौ तक जाने पर सैंतालीस, और ढाई सौ से पाँच सौ तक जाने पर इक्यावन — यानी पैसा दुगुना करने पर बचत सिर्फ़ चार महीने बढ़ती है। आपका बकाया इन पंक्तियों से बिलकुल अलग जगह बैठेगा, इसलिए इन्हें आड़ी पढ़ने के बजाय ऊपर का कैलकुलेटर भरिए।

फ़ॉर्मूला

यह वही अमॉर्टाइज़ेशन है जो तय क़िस्त वाले पेज पर चलता है, बस दो बार: एक बार P = A पर और एक बार P = A + E पर, जहाँ A तयशुदा मासिक क़िस्त है और E हर महीने जोड़ी जाने वाली अतिरिक्त रक़म

B
आज बाक़ी खड़ी रक़म
r
मासिक ब्याज दर: सालाना दर को बारह से भाग देने पर
A
तयशुदा मासिक क़िस्त, वही मानक अमॉर्टाइज़ेशन सूत्र से
E
हर महीने क़िस्त के ऊपर जोड़ी जाने वाली रक़म
m
A + E देते हुए बकाया के शून्य तक पहुँचने के महीने
s
बचे महीने: तयशुदा अवधि में से m घटाने पर

इसका इस्तेमाल तब कीजिए जब हाथ में कुछ ज़्यादा हो और यह तय करना हो कि उसे क़र्ज़ में डाला जाए या कहीं और। जवाब हमेशा वही नहीं होता: अगर आपकी बचत खाते की दर क़र्ज़ की दर से ऊपर है और वह रक़म आपात ख़र्च के लिए भी खुली रहेगी, तो जल्दी चुकौती का फ़ायदा कम पड़ता है — वहाँ बचा ब्याज है, पर उसके बदले तरलता चली जाती है, और एक बार डाली गई रक़म दोबारा निकालने पर आसानी से नहीं मिलती। जहाँ क़र्ज़ की दर ऊँची है वहाँ यह गणित सीधा है, और यह पेज दोनों तरफ़ के आँकड़े अलग-अलग दिखाता है, ताकि तुलना पूरी हो। यह देखना हो कि हर महीने थोड़ी-थोड़ी रक़म बढ़ाने का असर कहाँ पहुँचता है या एक बार की बड़ी रक़म कहाँ बैठती है, तो नीचे की सारणी देखिए — अंतर महीनों की गिनती में साफ़ दिखता है, क्योंकि हर महीने दी जाने वाली रक़म अवधि के मामले में एकमुश्त रक़म से हमेशा ज़्यादा असर डालती है।

हल किए हुए उदाहरण

  1. 3,20,000 पर 6.5%, 360 क़िस्तें बाक़ी, हर महीने 300 ज़्यादा

    1. तयशुदा क़िस्त: 3,20,000 × 0.00541667 × 1.00541667^360 ÷ (1.00541667^360 − 1) = 2,022.62
    2. हर महीने दी जाने वाली रक़म: 2,022.62 + 300 = 2,322.62
    3. इस रक़म से बकाया 254 महीनों में शून्य पर पहुँचता है, यानी 21.2 साल
    4. बचे महीने: 360 − 254 = 106, यानी 8.8 साल
    5. अतिरिक्त भुगतान के साथ कुल ब्याज: 2,69,695.73
    6. बिना अतिरिक्त भुगतान के कुल ब्याज: 4,08,140.64
    7. बचा ब्याज: 4,08,140.64 − 2,69,695.73 = 1,38,444.91

    जोड़ी गई रक़म और बचत का अनुपात ही यहाँ की असली ख़बर है: 106 महीने × 300 = 31,800 जोड़े गए, और 1,38,444.91 बचे — यानी बचत जोड़ी गई रक़म का चार गुना से ज़्यादा। बाक़ी फ़र्क़ उस ब्याज का है जो अब कभी लगेगा ही नहीं, और वही वजह है कि शुरुआत में किया गया छोटा-सा इज़ाफ़ा आख़िर में किए गए उसी इज़ाफ़े से कहीं ज़्यादा काम करता है।

  2. वही मॉर्टगेज, बिना कुछ ज़्यादा दिए

    1. अतिरिक्त भुगतान शून्य है, इसलिए हर महीने 2,022.62 ही जाता है
    2. बकाया ठीक 360 महीनों में ख़त्म होता है, यानी पूरी तीस साल
    3. बचे महीने 0 और बचा ब्याज 0.00
    4. दोनों तरफ़ ब्याज एक ही है: 4,08,140.64

    यह पंक्ति कुछ न बदलने की क़ीमत है, और साथ ही वह आधार जिससे बाक़ी हर विकल्प नापा जाता है। यहाँ बचा ब्याज शून्य दिखना कमी नहीं है — यह वही क़र्ज़ है जिससे ऊपर वाले उदाहरण का 1,38,444.91 निकला था, बस उसमें 300 जोड़े बिना।

  3. 36,000 की बिना ब्याज क़िस्तें, हर महीने 200 ज़्यादा

    1. दर शून्य है, इसलिए तयशुदा क़िस्त: 36,000 ÷ 36 = 1,000.00
    2. हर महीने दी जाने वाली रक़म: 1,000.00 + 200 = 1,200.00
    3. इस रक़म से बकाया 30 महीनों में शून्य पर पहुँचता है, यानी 2.5 साल
    4. बचे महीने: 36 − 30 = 6, यानी 0.5 साल
    5. दर शून्य है, इसलिए दोनों तरफ़ ब्याज 0.00 और बचा ब्याज भी 0.00

    दर शून्य हो तो जल्दी चुकौती से पैसा नहीं बचता, सिर्फ़ महीने बचते हैं — यहाँ 6 महीने। यही वह मामला है जो दिखाता है कि अतिरिक्त भुगतान का पूरा फ़ायदा ब्याज से आता है: ब्याज न हो तो जल्दी चुकाना सिर्फ़ काग़ज़ी राहत है, और वह रक़म कहीं और रखी जा सकती थी।

सीमाएँ

यह पेज दो बातें नहीं जानता, और दोनों उसके नतीजे को बदल सकती हैं। पहली: दर. यहाँ यह मान लिया जाता है कि दर वही रहेगी जो आपने डाली — तैरती दर वाले क़र्ज़ पर दर घटे तो जल्दी चुकौती का फ़ायदा उतना नहीं रहता, और दर बढ़े तो उससे ज़्यादा रहता है। दूसरी: जुर्माना. कुछ क़र्ज़ों में समय से पहले चुकाने पर शुल्क लगता है या पहले कुछ साल बंद रहता है, और वह शुल्क बचाए गए ब्याज में से घटाना पड़ता है — इस पेज में वह शामिल नहीं है। इसी तरह, यह क़र्ज़ के बदले क़र्ज़ लेने या रीफ़ाइनेंस से इसकी तुलना नहीं करता; दोनों रास्ते अलग पेजों पर हैं। अमेरिका में आवासीय क़र्ज़ के ब्याज पर मिलने वाली कर-छूट का हिसाब भी इसमें नहीं है, और वही चीज़ भारत में अलग नियमों से चलती है — भारत में आवासीय क़र्ज़ के ब्याज पर छूट की सीमा और शर्तें हर साल के केंद्रीय बजट और आयकर प्रावधानों से तय होती हैं, इसलिए वहाँ रहने वाले पाठक को अपनी स्थिति के लिए चालू वर्ष के नियम देखने चाहिए। आख़िरी बात: यह कैलकुलेटर अतिरिक्त भुगतान को हर महीने एक जैसा मानता है। असल ज़िंदगी में लोग कभी 500 डालते हैं, कभी कुछ नहीं — और हर वह महीना जिसमें कुछ नहीं डाला गया, अवधि को थोड़ा पीछे धकेल देता है, हालाँकि नतीजा आम तौर पर यहाँ दिखाए आँकड़े के आसपास ही रहता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

हर महीने थोड़ी ज़्यादा रक़म देने से असल में कितना बचता है?
जितना ज़्यादातर लोग सोचते हैं, उससे कहीं ज़्यादा — और बचत का बड़ा हिस्सा ब्याज से आता है, जमा की गई रक़म से नहीं। 3,20,000 पर 6.5% और 360 क़िस्तें बाक़ी होने पर हर महीने 300 जोड़ने से क़र्ज़ 106 महीने पहले ख़त्म होता है और 1,38,444.91 का ब्याज बचता है, जबकि पूरी अवधि में जोड़ी गई रक़म सिर्फ़ 31,800 बनती है।
क़र्ज़ जल्दी चुकाऊँ या वही रक़म बचाकर रखूँ?
यह तुलना तीन चीज़ों पर टिकती है: क़र्ज़ की दर, बचत पर मिलने वाली दर, और यह कि वह रक़म आपात स्थिति में चाहिए या नहीं। बचत की दर क़र्ज़ की दर से ऊपर हो और रक़म तरल रहे, तो सिर्फ़ ब्याज के आँकड़े से फ़ैसला नहीं होता। मगर यह भी देखिए कि क़र्ज़ में डाली गई रक़म वापस माँगने पर नहीं मिलती, जबकि बचत खाते की रक़म मिलती है — यही अंतर अक्सर पूरे गणित से ज़्यादा मायने रखता है।
बचा ब्याज जोड़ी गई रक़म से इतना बड़ा क्यों होता है?
क्योंकि बचत दो जगह से आती है। एक तो वही रक़म जो आपने ज़्यादा दी, और दूसरी वह ब्याज जो उस रक़म के कारण कभी लगा ही नहीं — और ब्याज हर महीने बाक़ी रक़म पर लगता रहता है, इसलिए जल्दी घटाया गया बकाया आगे के हर महीने में बचत करता जाता है। ऊपर के उदाहरण में यही वजह है कि 31,800 जोड़कर 1,38,444.91 बचता है।
क्या इसमें समय से पहले चुकाने का जुर्माना जुड़ा है?
नहीं। कुछ क़र्ज़ों में पहले कुछ सालों तक अतिरिक्त भुगतान पर शुल्क लगता है या सीमा होती है, और तब यहाँ दिखाया बचा ब्याज उतना नहीं रहता — शुल्क की रक़म उसमें से घटानी पड़ती है। क़र्ज़ का दस्तावेज़ देखिए, और अगर शुल्क है तो बड़ी अतिरिक्त रक़म डालने से पहले हिसाब लगाइए कि फ़ायदा बचा रहता है या नहीं।
क़र्ज़ ख़त्म होने से पहले दर बदल जाए तो?
तो यह पेज सिर्फ़ अनुमान दे रहा है। यहाँ दर पूरी अवधि के लिए एक ही मानी गई है; तैरती दर पर क़िस्त बदलती रहती है और बचा ब्याज दोनों तरफ़ हिल जाता है। दर बढ़ने पर जल्दी चुकौती का फ़ायदा बढ़ता है, दर घटने पर घटता है। इसलिए बचत को एक तय रक़म न मानकर यह जाँचते रहिए कि आपकी चालू दर पर वह अब भी उतनी बनती है या नहीं।
क्या यही हिसाब कार या पर्सनल लोन पर भी लगेगा?
लगेगा, बशर्ते क़र्ज़ की क़िस्त तय हो और ब्याज बाक़ी रक़म पर लगता हो। 36,000 की बिना ब्याज क़िस्तों वाला ऊपर का उदाहरण वही मामला है — वहाँ जल्दी चुकाने से महीने बचते हैं पर ब्याज शून्य ही रहता है, क्योंकि बचाने को कुछ था ही नहीं। जहाँ ब्याज तय रक़म के रूप में पहले से जुड़ा हो या क़िस्तें घटती-बढ़ती हों, वहाँ यह गणित नहीं बैठेगा।

संदर्भ

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